ज़िन्दगी से कल अकस्मात ही मुलाक़ात हो गयी
कुछ अनकही और अनसुनी सी वार्तालाप भी हो गयी
ज़िन्दगी के कुछ कायदे कानून जानता ना था मैं
पर फिर भी बातें हुई
अजीब तरह से हुई
कुछ जुर्म लगाये गए
कुछ के लिए दोषी भी ठहराया गया
सारे गुनाह भी कबूल किये
सबकी सज़ा भी मानी
उम्र कैद थी या आजीवन कारागार…….
५ वर्ष कारागार में बीते
पता नहीं कौन सा फैसला फिर से सुनाया गया
की सारे गुनाहों से बेगुनाह हो गया
जब आना नहीं था तो डाल दिया
अब जाना नहीं है तो निकाल दिया
पर मुझे पता था की गुनाहगार कौन थी
सोचना चाहा की गुनाहगार की साजिश क्या थी
जब मुक़मल हुई आरजू उसकी
तो गुनाहगार उसको नहीं पाया
किसी और शक्स को भी नहीं पाया
जब पलट कर देखा तो
वो अपनी दास्ताँ सुना के जा चुकी थी
खडा इंतज़ार में था तो
की अगर वो गुनाहगार फिर मिले तो
कम से कम इतना पूछ लूंगा ज़रूर
गुनाह गुनाहगार से नहीं तो किस से हुई थी ?


Posted by Arun on January 23, 2008 at 11:24 am
i appreciate ur sincear effort that u r trying to express ur thots via means of story tellin and poems….thats somthing admiring
in u keep rocking .. bro
Posted by pallavi on January 23, 2008 at 6:46 pm
gud…….very gud ……….keep up d gud wrk…….waise i dn like poems much…..infact i hardly read ny….bt dis 1 really nice