चलो चलो तुम चाल चलो
इस दुनिया में शतरंज ऐसे ही खेली जाती है
काले और सफ़ेद घरो में
अपने कदमो के निशान रखो
चलो चलो तुम चाल चलो
एक वजीर मेरा
एक सिपाही तेरा
दोनों रहे ना रहे
शतरंज की बिसात फिर बिछेगी
फिर खेलेंगे दो लोग ..
हारेगा एक और
जीतेंगे मोहरे अनेक …
चलो चलो तुम चाल चलो
आज यह शतरंज रास ना आता है
वही सफ़ेद और काले घर फिर से दौडाते है
खेल खेल की तरह चलता
गर
तो जीत जाते प्यादे भी वजीर से
घोडे जब दौड़ते सफ़ेद से काले
और काले से सफ़ेद खानों में
तो एक नया खेल होता
जिसमें रोमांच होता
एक मकसद होता
एक जीत की लालसा होती
चलो चलो तुम चाल चलो
यह शतरंज ऐसे ही खेली जाती है
सफ़ेद और काले
काले और सफ़ेद यही
ज़िन्दगी बन जाती है
ज़िन्दगी के रंग जब सिर्फ
सफ़ेद और काले लगे
तब फिर से बिछती है एक बिसात
खिलाडी होते है दो
एक मैं और दूसरा मेरा प्रतिबिम्ब ….
ज़िन्दगी के रंग जब होते है अनेक
लाल पीले गुलाबी हरे
तो एक एहसास होता है
देख आ के ध्यान से
मेरे उस बिसात के घर में
उन काले और सफ़ेद घरो में
वोह तेरे होली के
लाल पीले गुलाबी हरे
गुलाल के रंग आज भी छप गए है
अब मेरी शतरंज में रंग है अनेक
चलता हूँ आज भी चाल
चलो चलो तुम भी चलो …
यह शतरंज ऐसे ही खेली जाती है


Posted by ZED on June 2, 2008 at 12:40 pm
I am unable to get what you want to convey…..
Please give a small description of the poems u write which will be helpful for persons like me……