गुम

कुछ गुम है कही

अर्थ कही तो शब्द गुम है कही

बातें कही तो मुलाकातें कही

रात का संनात्ता कही

तो दिन का शोर भी कही

सुबह की हल्छल कही

तो शाम के वोह अड्डे कही

कुछ कुछ गुम सा है …

वोह धुएं में उड़ते पत्ते

वोह टापू पे लिम्का का गिरना

वोह क्रिकेट की लड़ाई

गिनती के 4० तो कही 41.

सब गुम है साले

वोह ढाई बजे रात की चाय

बेमतलब की बातें

इम्तिहान का कलेश

सब साले ऐसे महफ़िल में महफूज़ थे

की सब अपने आप में ही गुम थे

गुम थे रास्ते, कहा पता था मंजिल का भी

एक लड़कपन , एक उन्माद

उन्माद में से एक उत्पात

गुम था दिमाग भी ना जाने कहा

आज ना जाने सब कहा

अपनी डगर अपने सफ़र

गुम उनके मन में भी वोह

वोह उड़ते पत्ते

वोह आधी रात की चाय

वोह दीवारों से कूदते लोग

सुबह ४ बजे कढाई में खनखन

वोह आधे कच्चे चावल

गुम है आज भी कही …

सबकी आहट तो गूंजी होगी आज भी

उन गुम रास्तो में,

ट्रक्टर के धुएं पे पीछे भागते लोगो में भी

कही गुम अब हम भी हो गए होंगे

क्युकी सब साले गुम है

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~ by sandeep sinha on February 23, 2010.

One Response to “गुम”

  1. excuse me…sir…
    yu must know actually ki gum kya hai….
    its really unfair that yu dont mention even once wht actually is missin….
    huhhhh…..anyways….nice composition…as perfect as me… :)

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