लाल
लगता है सूरज ढलने को ही है
लालिमा ही तो है, शायद.
सब कुछ लाल होने को ही है
पर कही कुछ कोने में भी है
सब कुछ लाल होने को ही है
पर दिल में डर कही कुछ खोने को भी है
उगते का लाल अलग, डूबते का लाल अलग
दोनों अलग से कभी लगते गलत
अघाज़ और अंजाम दोनों के बीच
लड़ता यह अपनी माँ का लाल
हे झूले लाल, सम्हाल के तू लाल
कही यही लाल सूरज को दुब्वाता है
कही यही लाल उसको उगवता है
लाल से ही जन्मे बहुत से बवाल
उनको बवालों को हल भी मिला कइयो को लाल
समझ गर तू लाल की लाली
पा जाएगा जीवन के अंत की खुशहाली
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you are an inspirational poet..never had imagined so deep is color “red”….
lukin f/w to read more from you…
Love
Reety